हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो सदियाँ बीत जाने के बाद भी कभी पुराने नहीं होते। समय की धूल उनकी चमक को धुंधला नहीं कर सकती, सल्तनतों की हैबत उनकी आवाज़ को ख़ामोश नहीं कर सकती और अकीदत के गहरे पर्दे भी उनकी हक़ीक़त को छिपा नहीं सकते। वे हर दौर में ज़िंदा रहते हैं, हर पीढ़ी के ज़मीर को झकझोरते हैं और हर इंसाफ़पसंद इंसान को अपने सामने जवाबदेह होने पर मजबूर कर देते हैं।
हज़रत अम्मार बिन यासिर रिज़वानुल्लाह तआला अलैह की शहादत भी ऐसा ही एक अबदी सवाल है।
यह प्रश्न किसी फ़िर्क़े, किसी मुनाज़रे या किसी सियासी वाबस्तगी का नहीं, बल्कि ख़ुद रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम के उस स्पष्ट फ़रमान का है, जो चौदह सदियों से उम्मते मुस्लिमा के ज़मीर को मुख़ातिब किए हुए है।
आख़िर वह कौन-सा मेयार है कि जिस सहाबी के बारे में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम ने फ़रमाया: "अम्मार को एक बाग़ी जमाअत क़त्ल करेगी।" उसी सहाबी के क़ातिलों की चर्चा आते ही बहुत-से ज़ेहन तज़बज़ुब का शिकार हो जाते हैं। आख़िर यह कैसा अंदाज़-ए-फ़िक्र है कि मक़तूल की फ़ज़ीलत तो पूरे एहतराम के साथ बयान की जाती है, लेकिन क़ातिल की ज़िम्मेदारी पर ख़ामोशी इख़्तियार कर ली जाती है? यह इतिहास का कैसा अलमिया है कि हज़रत अम्मार रिज़वानुल्लाह तआला अलैह का ख़ून तो हक़ की गवाही देता है, मगर उस ख़ून से जुड़ी हुई तारीखी हक़ीक़त को मुख़्तलिफ़ तावीलों के पर्दों में छिपाने की कोशिश की जाती है।
अगर हज़रत अम्मार बिन यासिर रिज़वानुल्लाह तआला अलैह एक आम सहाबी होते, तो शायद इतिहास उन्हें केवल एक महान मुजाहिद और शहीद के रूप में याद करता। लेकिन वे उन ख़ुशनसीब हस्तियों में से हैं, जिनके ईमान की गवाही ख़ुद क़ुरआन मजीद ने दी, जिनकी इस्तिक़ामत की तस्दीक़ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम ने फ़रमाई, जिन्हें जन्नत की बशारत सुनाई गई और जिनकी शहादत की ख़बर भी पहले ही ज़बान-ए-नुबुव्वत से दे दी गई। यही वजह है कि हज़रत अम्मार रिज़वानुल्लाह तआला अलैह की शहादत केवल एक व्यक्ति की शहादत नहीं, बल्कि हक़ और बातिल के बीच खिंची हुई एक फ़ैसला-कुन लकीर है, जिसे इतिहास का कोई क़लम मिटा नहीं सका।
इतिहास का सबसे बड़ा अलमिया यह नहीं कि ज़ुल्म पैदा होता है, बल्कि यह है कि कभी ज़ुल्म को भी तक़द्दुस का लिबास पहना दिया जाता है, ताक़त को हक़ का मेयार समझ लिया जाता है और इक़्तिदार को इंसाफ़ पर तरजीह दे दी जाती है। जब ऐसा होता है, तो इतिहास अपने पन्ने स्याही से नहीं, बल्कि मज़लूमों के ख़ून से लिखता है। ऐसे ही नाज़ुक मोड़ पर हज़रत अम्मार बिन यासिर रिज़वानुल्लाह तआला अलैह जैसी शख़्सियतें मीनार-ए-हिदायत बनकर उभरती हैं, ताकि आने वाली नस्लें जान सकें कि हक़ हमेशा अक़्सरियत या इक़्तिदार के साथ नहीं होता, बल्कि कभी एक बूढ़े, कमज़ोर मगर बा-ईमान मुजाहिद के लहू में भी पूरी आब-ओ-ताब के साथ जलवा-गर होता है।
हज़रत अम्मार रिज़वानुल्लाह तआला अलैह महज़ एक शख़्सियत का नाम नहीं, बल्कि हक़-शनासी का एक मेयार हैं। उनकी ज़िंदगी और शहादत इस हक़ीक़त का एलान है कि ईमान का तक़ाज़ा केवल रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम से मुहब्बत का दावा करना नहीं, बल्कि उनके फ़ैसलों को बिला चूँ-ओ-चरा क़बूल करना भी है।
अगर हम हज़रत अम्मार रिज़वानुल्लाह तआला अलैह को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम का जलीलुल-क़द्र सहाबी मानते हैं, तो फिर उनके बारे में इरशाद-ए-नबवी को भी उसी इख़्लास के साथ तस्लीम करना होगा। और अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम ने उनके क़ातिलों को "फ़िअत-ए-बाग़ियह" क़रार दिया है, तो इंसाफ़ का तक़ाज़ा यही है कि मुहब्बत, वफ़ादारी और अकीदत का मेयार भी उसी मीज़ान-ए-नुबुव्वत से तय हो, न कि बाद के सियासी या तारीखी जवाज़ों से।
आज सिफ़्फ़ीन का मैदान ख़ामोश है। तलवारें मिट्टी में दफ़्न हो चुकी हैं, ख़ेमे उजड़ चुके हैं और सिपाहियों की सदाएँ इतिहास के पन्नों में महफ़ूज़ हो गई हैं। लेकिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम का एक जुमला आज भी उसी क़ुव्वत, स्पष्टता और हुज्जत के साथ फ़िज़ाओं में गूँज रहा है— "अम्मार को एक बाग़ी जमाअत क़त्ल करेगी।
अब फ़ैसला हर इंसाफ़पसंद मुसलमान के ज़मीर पर है कि वह इस फ़रमान-ए-नबवी को महज़ एक तारीखी वाक़िआ समझे या उसे हक़ और बातिल की पहचान का स्थायी मेयार क़रार दे। क्योंकि इतिहास के फ़ैसले बदल सकते हैं, मोअर्रिख़ीन की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम का फ़रमान न बदलता है और न उसकी हुज्जियत में कभी कोई कमी आ सकती है।
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